, गुजरात: 9 जुलाई 2025 की सुबह वडोदरा जिले में एक और दर्दनाक हादसे ने राज्य में विकास और सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी। पादरा और आणंद को जोड़ने वाला महिसागर नदी पर बना गंभीरा पुल अचानक भरभराकर गिर पड़ा। इस भीषण दुर्घटना में 20 से ज्यादा लोगों की जान चली गई और कई परिवार बिखर गए। यह घटना 2022 के मोरबी पुल हादसे की भयावह यादें फिर से ताजा कर गई।
सुबह की त्रासदी: कैसे टूटा भरोसे का पुल? बुधवार सुबह करीब 7:30 बजे का वक्त था। लोग रोज की तरह काम पर निकल रहे थे। उस वक्त पुल पर दो ट्रक, एक पिकअप, एक वैन और एक ऑटो रिक्शा गुजर रहे थे। अचानक पुल का एक हिस्सा चरमराया और देखते ही देखते महिसागर नदी में समा गया। चंद पलों में जो रास्ता था, वो मलबे और पानी में तब्दील हो गया – और साथ ही डूब गईं कई ज़िंदगियाँ।
20 से अधिक की मौत, कई घायल और एक लापता घटना के कुछ ही मिनटों में यह एक बड़े पैमाने की त्रासदी में बदल गई। अब तक 20 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई लोग घायल हैं और अस्पतालों में इलाजरत हैं। एक व्यक्ति अभी भी लापता है, जिसे ढूंढ़ने के लिए राहत और बचाव दल लगातार प्रयास कर रहे हैं। हर मौत एक परिवार के सपनों का अंत है, और हर जख्म दर्द की गहरी कहानी कहता है। बचाव में मुश्किलें और पुल की असलियत हादसे के तुरंत बाद NDRF, SDRF और स्थानीय प्रशासन ने राहत कार्य शुरू किया, लेकिन हालात आसान नहीं थे। नदी कीचड़ से भरी हुई थी, जिसकी गहराई करीब 3.5 मीटर बताई जा रही है।
ऊपर से सोडा ऐश का रिसाव और सल्फ्यूरिक एसिड से भरा टैंकर भी नदी में गिर गया था, जिससे बचाव अभियान और भी मुश्किल हो गया। यह पुल 1985 में बना था, यानी करीब चार दशक पुराना। शुरुआती जांच में पाया गया कि पुल के “पेडस्टल और आर्टिक्यूलेशन जोड़ों” में टूट-फूट आई थी। सवाल यह है कि क्या किसी ने पुल की खराब हालत पर ध्यान नहीं दिया? समय रहते मरम्मत क्यों नहीं की गई? आम जनता के मन में ये सवाल गहराई से बस गए हैं। मोरबी से गंभीरा: क्या हमने कुछ सीखा? यह कोई पहली बार नहीं है जब गुजरात में ऐसा हादसा हुआ हो।
अक्टूबर 2022 में मोरबी में केबल पुल गिरने से 135 लोगों की जान गई थी। उस समय भी रखरखाव और प्रशासन की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल उठे थे। अब गंभीरा हादसे ने वही जख्म फिर से हरे कर दिए हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने घटना के बाद सड़क एवं भवन विभाग के चार इंजीनियरों को निलंबित कर दिया है और राज्य के सभी 7000 पुलों की जांच के आदेश दिए हैं। ये कदम ज़रूरी जरूर हैं, लेकिन क्या सिर्फ इतना ही काफी है? क्या लापरवाही की भेंट चढ़ी ज़िंदगियां यूं लौट सकती हैं?
यह हादसा महज एक पुल के गिरने की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे तथाकथित विकास पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यह दिखाता है कि जब बुनियादी ढांचे की अनदेखी होती है और सुरक्षा को नजरअंदाज किया जाता है, तो उसकी कीमत इंसानी जानों से चुकानी पड़ती है। गंभीरा पुल हादसा हमें झकझोरता है: क्या हम यूं ही लापरवाही के आगे हार मानते रहेंगे? गुजरात को अब ठानना होगा कि विकास के हर कदम के साथ सुरक्षा और जवाबदेही भी चले – वरना फिर कोई पुल ढह जाएगा, और फिर कोई परिवार उजड़ जाएगा।
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