समय भास्कर मुंबई / ActAbhi Review – रेटिंग: ⭐⭐ (2/5)
जब 2012 में अजय देवगन की फ़िल्म ‘Son of Sardaar’ रिलीज़ हुई थी, तो दर्शकों को एक ज़बरदस्त कॉमेडी मिली थी, जिसमें हंसी, एक्शन और इमोशन का सही मिश्रण था। सालों के इंतज़ार के बाद, जब ‘Son of Sardaar 2’ की घोषणा हुई, तो उम्मीदें आसमान छू रही थीं। लेकिन अफ़सोस, यह फ़िल्म उन उम्मीदों को पूरा करने के बजाय उन्हें टुकड़ों में बिखेर देती है। यह एक ऐसी फ़िल्म है जिसे देखते हुए आपको लगता है कि आप 13 साल पीछे चले गए हैं, लेकिन उस समय की अच्छी यादों के साथ नहीं, बल्कि उन पुराने और घिसे-पिटे जोक्स के साथ। इससे अच्छा होता की पहली वाली को ही दुबारा रिलीज़ कर देता तो इतने पैसे बर्बाद नहीं होते।
कहानी: एक उबाऊ और घिसा-पिटा प्लॉट
फ़िल्म की कहानी शुरू होती है सरदार जस्सी (अजय देवगन) से, जो 13 साल की लंबी वीज़ा प्रक्रिया के बाद लंदन पहुंचते हैं, अपनी पत्नी डिंपल (नीरू बाजवा) के पास। लेकिन उनका स्वागत एक गर्मजोशी भरी झप्पी से नहीं, बल्कि तलाक की मांग से होता है।
अब जस्सी बेघर हो जाते हैं और उनकी मुलाकात राबिया (मृणाल ठाकुर) से होती है, जो एक पाकिस्तानी वेडिंग प्लानर है और खुद अपने धोखेबाज पति दानिश (चंकी पांडे) से परेशान है। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब जस्सी, राबिया की मदद करने के लिए, खुद को एक आर्मी कर्नल और उसका पति बताता है। यह झूठ इसलिए बोला जाता है ताकि राबिया की सौतेली बेटी सबा की शादी गोगी (साहिल मेहता) से हो सके। समस्या यह है कि गोगी के पिता राजा संधू (रवि किशन), एक बेहद ही सख्त और रूढ़िवादी व्यक्ति हैं, जिन्हें पाकिस्तानी और डांसर्स से नफ़रत है, और राबिया एक पाकिस्तानी डांसर है!
फ़िल्म की पूरी कहानी इसी झूठ के इर्द-गिर्द घूमती है। यह प्लॉट इतना पुराना है कि इसे देखते हुए लगता है कि आप कोई पुरानी कॉमेडी फ़िल्म देख रहे हैं, जिसके चुटकुले अब बासी हो चुके हैं।
एक्टिंग : टैलेंट की बर्बादी
फ़िल्म की सबसे बड़ी निराशाजनक बात इसकी एक्टिंग और डायरेक्शन है।
अजय देवगन ने अपनी पूरी कोशिश की है कि वह अपनी कॉमिक टाइमिंग से फ़िल्म को बचा सकें। कुछ दृश्यों में उनकी कोशिशें कामयाब भी होती हैं, लेकिन कमज़ोर स्क्रिप्ट और थके हुए जोक्स के कारण वह भी दर्शकों को हंसने पर मजबूर नहीं कर पाते। मृणाल ठाकुर जैसी टैलेंटेड एक्ट्रेस को एक कमज़ोर और बिना सिर-पैर के किरदार में देखना दुखद है। उनके किरदार में कोई गहराई नहीं है, और ऐसा लगता है जैसे उन्हें बस इसलिए लिया गया है ताकि फ़िल्म में एक फीमेल लीड हो।रवि किशन, चंकी पांडे और संजय मिश्रा जैसे बेहतरीन कलाकारों का पूरी तरह से दुरुपयोग किया गया है। उनका टैलेंट ओवर-एक्टिंग और पुराने जोक्स में दबकर रह गया है।
डायरेक्शन- विजय कुमार अरोड़ा का डायरेक्शन भी निराशाजनक है। उन्होंने एक कॉमेडी बनाने की कोशिश की है, लेकिन वह कॉमेडी नहीं, बल्कि एक शोर-शराबे वाली फ़िल्म बन गई है। भारत-पाकिस्तान पर घिसे-पिटे जोक्स और जबरदस्ती की सिचुएशनल कॉमेडी हंसाने की बजाय इरिटेट करती है।
Son of Sardaar 2′ एक ऐसी फ़िल्म है जो अपने पहले भाग के नाम और सफलता को भुनाने की कोशिश करती है, लेकिन इसमें पूरी तरह से नाकाम रहती है। यह एक बिना सिर-पैर की कहानी, कमज़ोर कॉमेडी और निराश कर देने वाली परफॉरमेंस का मिश्रण है। अगर आप एक अच्छी और ताज़ी कॉमेडी देखना चाहते हैं, तो इस फ़िल्म से दूर रहना ही बेहतर है। यह फ़िल्म देखकर आपका पैसा और समय दोनों बर्बाद हो सकता है। इसे छोड़ देना ही समझदारी है।
