-बह न जाये भावों में भी भीगी जीवन की परीक्षा

-कर्म एक ऐसा धन है वह स्वर्ग तक देता है साथ
संपादक की कलम से
सृष्टि कर्त्ता की दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट है। व्यक्ति अनमोल, सृष्टि कर्त्ता के लिए विशेष रूप से मूलवान भी है। परमेश्वर की दृष्टि में व्यक्ति विशेष है, ईश्वर की इस रचना में मनुष्य जो भी भूमिका निभाता है उस स्थान को कोई नहीं ले सकता। क्योंकि उस प्राणी को ईश ने जो खास भूमिकायें दे रखी हैं। उसने उससे यह अपेक्षा भी की है कि उसे मिली भूमिका को सार्थक तरीके से निभाएँ, उसे सम्मान दे और अपनी शक्ति से अविश्वसनीय काम करते हुए मानव की तरह जिये और सृष्टि निर्माता के हृदय को खुश करते हुए पृथ्वी पर फैली योजनाओं को पूरा करने में अपना पूर्ण योगदान दे।

आज से शुरू हो रहे पितृ पक्ष जो, अतीत, वर्तमान और भविष्य की स्मृतियों को जोड़ने के साथ उनके त्याग, बलिदान का स्मरण करते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने, सत्य को समझने आदि की यह साधना का समय है। यह धार्मिक अनुष्ठान पितरों के जीवन दर्शन, संस्कार, परंपरा, मूल्यों व वंश परंपरा की जड़ों से जुड़ने, अतीत का सम्मान करने का संदेश वाहक है। पितृ पक्ष का भाव जीवन के सत्य को समझने की साधना भी है। वह हमें विनम्रता, सेवा और कृतज्ञता का मार्ग भी दिखाता है।

सृष्टि कर्त्ता की इस व्यक्ति विशिष्टता के क्रम में बार एसोसिएशन फिरोजाबाद के पूर्व अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता, समाजसेवी स्व: राकेश चंद्र मिश्रा ने मुझे पूर्व दिए साक्षात्कार में कहा था कि विधाता की यह प्राकृतिक सृष्टि एक रंगशाला सी लगती है, इस पृथ्वी मंच पर आकर व्यक्ति अपनी विविध प्रकार की भूमिकायें अभिनीत करता है। प्रकृति के इस वैभव को अगर हम मुग्ध भाव से देखें तो उसने मनुष्य को अनेक कलात्मक प्रतिभाओं से अलंकृत किया है। उनमें दैवीय व्यक्तित्व की रेखाएँ उभरने लगती हैं।

मुझे विधाता ने वकालत की ऐसी मन मोहिनी विद्या दी, और मैंने उन्हीं की दी शक्ति से वकालत को संसान पूर्वक प्राप्त किया जो मुझे सिद्ध हो गयी। काश मेरे पास सृष्टि का यह सम्वल नहीं होता तो मेरी जीवन नौका बीच में डूब जाती और समूचा परिवार अभावों,अपेक्षाओं आदि का शिकार हो जाता, पर उसकी कृपा से ऐसा नहीं हो पाया। इस रिद्धि सिद्धि ईश द्वारा सौंपी वकालत से अनेक उल्लेखनीय कार्य, सफलताएँ हासिल की, जनमानस को न्याय दिलाया, निर्धनों की सेवा की, समाजोस्थान, शिक्षा प्रसार आदि की प्रेरणा मिली।

ग्रामीण क्षेत्र का विकास व दीन हीन लोगों का सहारा बन उनकी मुश्किलों को दूर किया।यही नहीं उच्च स्तरीय माध्यमिक विद्यालय के माध्यम से अपने परम पूज्य परमार्थी पिता को जीवात बनाने के उद्देश्य से ब्लॉक मक्खनपुर के निकट पैतृक गांव साडूपुर में उनके संकल्प को पूरा किया। स्कूल निर्माण का मुख्य उद्देश्य शिक्षा प्रसार के साथ गांव का विकास करना, साधन हीन बच्चों को बेहतर शिक्षा देकर उज्जवल भविष्य का निर्माण निहितार्थ था।

सामाजिक क्षेत्र में बिखरी समस्याओं, देश दुनिया की खबरों से अवगत करने की दिशा में 16 वर्ष पूर्व एक साप्ताहिक समाचार पत्र “समय भास्कर” का प्रकाशन फिरोजाबाद में शुरू कराया जो कुछ महीने बाद दैनिक अखबार के रूप में परिवर्तित हो गया। इसमें मेरी यही भावना थी कि मेरे सुशिक्षित बच्चे इस माध्यम से समाज सेवा करते रहे। अखबार की लोकप्रियता में बच्चों सहित उनकी विदुषी धर्मपत्नी श्रीमती आशा मिश्रा का विशेष योगदान रहा। पत्र के संपादन, उत्थान,जन प्रतिनित्व एवं रचनात्मकता में उनका अतिम सहयोग रहा।

उन्हें पशु पक्षियों से अधिक प्रेम था। वह कहते थे की गाय- कुत्ता के शरीर पर प्रेम रस से सना हाथ फेर कर देखो तो उनके मुख मंडल पर आत्मानंद की ऊर्जा आभाशित होने के साथ उनके अधरों पर मुस्कान खेलती और आंखों में झांको तो खुशियां नाचती नजर आती है। उन्होंने एक बार कहा था कि प्रेम रूपी नाव पर अहंकार को मत बैठने देना, वरना वह प्रेम को मार देगा। यह उनकी पशु प्रेम की पराकाष्ठा थी।

उन्होंने कहा था बुद्धिमत्ता सहित सरल स्वभाव,संतुष्टि, क्षमा दान, विनम्रता, मानव जीवन के अमूल्य गहने हैं। अगर ईश्वर द्वारा प्रदत्त यह प्रतिभाएँ मेरे जीवन में नहीं होती तो मैं इस अनम्र जीवन के वज्रघात से टूट कर बिखर जाता। निष्काम शुभ कर्म से ही अंत: करण की शुद्धि होती है यही शुद्ध अंतःकरण ही ब्रह्म ज्ञान है, ब्रह्म ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं हैं। पिता, भाई व पूर्वज हमारे प्रथम देवता हैं और उनके द्वारा किए अनगिनत त्याग, तपस्या, बलिदान और आशीर्वाद हमें आगे बढ़ाने की प्रेरणा देते हैं।

इसी कथानक के बीच उनकी धर्मपत्नी आशा मिश्रा ने यह जोड़ा कि कर्म तो मन चित् की शुद्धिकरण के लिए होते हैं। मोक्ष तो तत्व विचार से उत्पन्न ब्रह्म ज्ञान से ही संभव है। उपासना से अंत: करण के सभी दोष मिट जाते हैं और जिज्ञासु आत्म ज्ञान प्राप्त कर लेता है। हम अकेले ही जन्मे और अकेला ही जाना है। कर्म एक ऐसा धन है वह स्वर्ग तक साथ देता है।श्री मिश्र का निधन 27 दिसंबर 2017 को हो गया था। उनकी मृत्यु अंत नहीं बल्कि नवजीवन की यात्रा का एक पड़ाव है और जिसमें जीवन के गहरे अर्थ सत्य को समझने का संदेश छिपा है।

दैनिक समय भास्कर समाचार पत्र के संस्थापक स्व: श्री राकेश चंद्र मिश्रा एडवोकेट के बीच इसी प्रकार की चर्चाएं अक्सर हुआ करती थी। उनके साहित्य के प्रति अगाध प्रेम, सामाजिक जीवन, परिश्रम एवं उनके मन मानस में आनंद का सागर लहराता व उत्साह के कमल खिलते देख हमने उन्हें “आनंद मूर्ति” उपाधि से विभूषित किया था। आज उनके आठवें पितृ पक्ष की शुभ बेला पर हम उनके द्वारा किये कृत, अतिम प्रतिमा के धनी स्व: राकेश चंद्र मिश्रा की उस दृढ़ता को जिससे वह जीवन की हर चुनौतियों का सामना, धैर्य, संतुलन बनाने व संस्कारों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों की निरंतरता बनाए रखकर जीवन जीने की कला का सम्मान करते हैं तथा आठवें पितृ पक्ष के शुभ अवसर पर हम उन्हें हृदय से श्रद्धा सुमन सहित श्रद्धांजलि भी अर्पित करते हैं।

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