समय भास्कर / Act Abhi Review – 4 */5 – कुछ कहानियाँ हमें इतिहास की किताबों में नहीं मिलतीं, लेकिन उनकी गूंज पीढ़ियों तक सुनाई देती है।इतिहास किताबें तक सीमित न रह कर जब सिनेमा के पर्दे पर आये और उन भयानक और काले दिनों को आपके सामने ला दे जो अब तक किताबों में आधा अधूरा लिखा आया और अब तक वर्षों की धूल से दवा हुआ था कुछ बताया कुछ छिपाया गया हो । द बंगाल फाइल्स एक ऐसा दिल दहला देने वाला अनुभव जो आपकी रूह को झकझोर देता है… दमदार अभिनय… ये सिर्फ़ सिनेमा नहीं है… ये पर्दे पर इतिहास है। ये एक ऐसा अनुभव है जिसको देखने के बाद आप कहेंगे कड़वे सच का सिनेमाई और सटीक चित्रण है द बंगाल फाइल्स

The Bengal Files ऐसी ही एक दास्तान है, जो 1946 के बंगाल के ख़ून से सने पन्नों को सामने रखती है। विवेक अग्निहोत्री ने अपनी ‘Files Trilogy’ का अंतिम हिस्सा बनाते हुए उस दौर की सच्चाइयों को बड़े परदे पर उतार दिया है और ये अनुभव जितना सिनेमाई है, उतना ही असहज और डराने करने वाला भी।

कहानी की शुरुआत होती है Direct Action Day और उसके बाद फैले दंगों से। भारती बनर्जी, एक मासूम लड़की, अपनी आंखों के सामने घर-परिवार की तबाही देखती है। भारती की आँखों में बसा डर, खोए हुए अपनों की याद और ज़िंदा रहने की तड़प… यही पूरी कहानी का सबसे बड़ा सच है।। इस किरदार को निभाया है सिम्रत्त कौर ने, और उनका एक लंबा मोनोलॉग आपको हिला कर रख देता है। दूसरी ओर है Ghulam Sarwar Husseini का खतरनाक और निर्दयी किरदार, जिसकी आँखों में सिर्फ़ नफ़रत और हिंसा झलकती है।

लेकिन फिल्म यहीं नहीं रुकती। परदे पर 2025 का भारत भी उभरता है, जहाँ CBI अफ़सर शिवा पंडित एक आदिवासी लड़की के गुमशुदा होने की जाँच करता है। उसकी खोज उसे भारती बनर्जी तक ले जाती है — अब बूढ़ी हो चुकी, लेकिन आज भी अपने जख्मों और सच के साथ ज़िंदा। पल्लवी जोशी ने इस उम्रदराज़ भारती को जिस संवेदनशीलता के साथ निभाया है, वो फिल्म का सबसे गहरा असर छोड़ता है।

मिथुन चक्रवर्ती, एक थके-हारे, शराब में डूबे अफ़सर के रूप में सामने आते हैं। उनका हर डायलॉग में ज़िंदगी की थकान और कड़वा सच मसहूस करने को मिलेगा है। अनुपम खेर ने महात्मा गाँधी का किरदार निभाया है। शाश्वत चटर्जी और बाकी कलाकार कहानी को मजबूती देते हैं। लेकिन सबसे ज़्यादा बात होती है पल्लवी और सिम्रत्त के अभिनय की — एक युवती का दर्द और एक बूढ़ी औरत का टूटकर भी जिंदा रहना, दोनों ही परदे पर खरे उतरते हैं।

तकनीकी स्तर पर फिल्म कसी हुई है, लेकिन तीन घंटे चौबीस मिनट का समय आसान नहीं है। कई दृश्य इतने खौफनाक हैं कि आप आँखें फेर लेना चाहेंगे। बैकग्राउंड स्कोर लगातार आपको दबाव में रखता है और निर्देशक का इरादा साफ है आपको आराम से बैठने नहीं देना।
निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की इस फिल्म और उनके सिनेमाई क्राफ्ट को लेकर तारीफ करनी होगी। वी इसमें सच के तो दिखाते है पर एक बात जो देखनी होगा वो है उनका इस सब को दिखाने का अंदाज। क्योकि सिनेमा आज के साथ भविष्य के लिए भी होता है।

जिन लोगो ने सही इतिहास को सामने नहीं लाने दिया वो आज भी नहीं चाहते की वो काली दिल दहला देने वाले इतिहास की सच्ची घटनाये सामने आएं । कहा जाता है की सच कड़वा होता है वो तब और भी कड़वा लगता है जब पूरा सच सामने आता है। इस फिल्म को लेकर दुनिया भर से प्रतिक्रियाएँ आ रही है । कोई इसे हार्ड-हिटिंग और गट-व्रेंचिंग यानि दिल दहला देने वाला , पेट में मरोड़ पैदा करने वाला कह रहा है, तो कोई प्रोपेगेंडा , कुछ लोगो के पास कहने को कुछ नहीं है तो इसको बहुत लम्बी फिल्म बता रहे है।

सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि ये फिल्म सिर्फ़ सिनेमा नहीं, बल्कि इतिहास का वो सच जिसको आज के दिन इसको पचा पाना कठिन होगा और उनके लिए तो खास कर जो जो सच को स्वीकारते तक नहीं है। वहीं कुछ आलोचकों को वैसे में बता दूँ ये कौन से आलोचक है और ये कहा से आते है भारत में ही है ये सब। आप होलोकॉस्ट जो बारे में कह कर दिखाओ वहां पर आपकी मंज़िल जेल होगी पर भारत में कश्मीर की सचाई हो या किसी और दवे सच को दिखाने के सही कोशिश , पर इन सब को इसमें बस एकतरफ़ा नज़रिया और अत्यधिक हिंसा दिखाई देती है। कश्मीर फाइल्स पर भी ये निकल आये थे।

अगर एक सिनेमा के स्टूडेंट के रूप में कहूं तो The Bengal Files एक सिनेमा का मास्टर पीस है और हर किसी को देखनी चाहिए और बता दूँ कि ये कतई आसान फिल्म नहीं है। ये आपको परेशान करती है, आपको सवालों में उलझाती है और आपको सोचने पर मजबूर करती है। अगर आप सच्चाई से मुँह चुराना चाहते हैं तो शायद ये फिल्म आपके लिए नहीं। लेकिन अगर आपके भीतर ये हिम्मत है कि इतिहास के दबे हुए जख्मों को देखें और समझने की कोशिश करें तो , तो ये फिल्म आपको झकझोर देगी। और एक सवाल आपके सामने छोड़ देगी हम अपने इतिहास से भागते क्यों है ?

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