Money Gullak Desk | Mumbai
डिजिटल पेमेंट और यूपीआई (UPI) इस्तेमाल करने वाले करोड़ों भारतीयों के लिए संसद से एक बड़ी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार ने लोकसभा से ‘टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेन्डिंग) बिल, 2026’ पास करा लिया है। इस बिल के पास होते ही सोशल मीडिया पर खबरें तैरने लगीं कि अब गूगल पे, फोनपे या अन्य ऐप्स से पेमेंट करने पर एक्स्ट्रा चार्ज देना पड़ेगा।
इन दावों में कितनी सच्चाई है और सरकार के इस नए कदम से आम जनता की जेब पर क्या असर पड़ेगा, आइए आसान शब्दों में पूरी बात समझते हैं।
क्या है नया कानून और क्या बदला है?
संसद में पास हुए इस नए बिल के जरिए ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ की धारा 10A में संशोधन किया गया है। अब तक लागू नियमों के मुताबिक, बैंकों या डिजिटल पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को UPI या RuPay पेमेंट्स पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) यानी किसी भी तरह का चार्ज वसूलने की सख्त मनाही थी।
नए संशोधन के जरिए सरकार ने इस कानूनी पाबंदी को हटा दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार ने अब खुद को यह कानूनी अधिकार दे दिया है कि वह नोटिफिकेशन जारी करके तय कर सके कि किस डिजिटल पेमेंट मोड पर चार्ज लगाया जा सकता है और किसे पूरी तरह फ्री रखना है।
क्या आम ग्राहकों के लिए महंगा हो जाएगा UPI?
अगर आप इस बात से परेशान हैं कि दोस्तों को पैसे भेजने या सब्जी-दूध खरीदने पर जेब से एक्स्ट्रा पैसे कटेंगे, तो राहत की बात यह है कि आम जनता के लिए UPI पूरी तरह फ्री रहेगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोशल मीडिया के जरिए विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए स्थिति साफ की है।
अगर भविष्य में कोई फीस लागू भी होती है, तो वह केवल दुकानदारों या व्यापारियों (Merchants) पर लगने वाला मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) होगा। यानी यह चार्ज उन बिजनेस संस्थाओं को डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के बदले बैंक को देना होगा। आम ग्राहकों द्वारा किए जाने वाले पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर पूरी तरह मुफ़्त रहेंगे। इसके अलावा, उम्मीद जताई जा रही है कि छोटे दुकानदारों को इस चार्ज के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा।
क्या अभी से कटना शुरू हो गया है चार्ज?
सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के विपरीत, बिल पास होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आज से ही पेमेंट्स पर चार्ज लगना शुरू हो गया है। सरकार ने अभी केवल एक कानूनी ढांचा (Framework) तैयार किया है, जिसके तहत अधिकार अपने पास रखे गए हैं।
अभी तक कोई निश्चित तारीख या दर (Rate) तय नहीं की गई है। बिल के पूरी तरह लागू होने के बाद नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) की एक विशेष कमेटी इस बात का आकलन करेगी कि चार्ज किन ट्रांजैक्शंस पर और कितना होना चाहिए। बाजार में ऐसी चर्चाएं जरूर हैं कि 2,000 रुपये से अधिक के बड़े कमर्शियल पेमेंट्स पर 0.25% से 0.4% तक का मर्चेंट चार्ज प्रस्तावित किया जा सकता है, लेकिन इस पर अंतिम फैसला होना बाकी है।
सरकार को क्यों उठाना पड़ा यह कदम?
भारत में डिजिटल पेमेंट्स का दायरा ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है, जहां अकेले जुलाई 2026 में 23.66 बिलियन से अधिक UPI ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए। इस विशाल नेटवर्क को चौबीसों घंटे चालू रखने, सर्वर्स को मेंटेन करने और साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाने में बैंकों और फिनटेक कंपनियों का भारी फंड खर्च होता है।
अब तक सरकार इन कंपनियों और बैंकों को वित्तीय मदद (Subsidy) देकर सिस्टम चला रही थी। हालांकि, लंबे समय तक इस नेटवर्क को आर्थिक रूप से मजबूत और टिकाऊ बनाए रखने के लिए सरकार ने यह नया रास्ता निकाला है ताकि सिस्टम का खर्च खुद डिजिटल इकोसिस्टम से ही निकल सके।
सोशल मीडिया पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
कानूनी बदलाव के बावजूद सोशल मीडिया पर यूजर्स लगातार अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं। आम लोगों और कई व्यापारियों को डर है कि अगर मर्चेंट्स पर 0.3% या 0.4% का चार्ज लगाया गया, तो दुकानदार उसकी भरपाई करने के लिए या तो सामान के दाम बढ़ा देंगे या फिर ऑनलाइन पेमेंट लेने से मना करके कैश की मांग करेंगे।
इसी संभावित इनडायरेक्ट आर्थिक बोझ की वजह से इंटरनेट पर इस फैसले को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है, हालांकि सरकार का पूरा जोर इस बात पर है कि आम यूजर के अनुभव और फ्री ट्रांजैक्शन सुविधा पर कोई असर न पड़े।
