समय भास्कर सिनेमा डेस्क –
अगर आप सोशल मीडिया पर ट्रेड पोर्टल्स की 4.5 और 5 स्टार रेटिंग्स देखकर थियेटर में टिकट बुक करने जा रहे हैं, तो जरा ठहरिए। ‘तलवार’ और ‘राज़ी’ जैसी कल्ट फिल्में देने वाली निर्देशक मेघना गुलज़ार की नई क्राइम-थ्रिलर ‘दायरा’ (Daayra) सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है।
143 मिनट (2 घंटे 23 मिनट) की यह फिल्म विचार के स्तर पर बेहद गंभीर है, लेकिन क्या यह थियेटर में दर्शकों को बांधने में कामयाब होती है? सोशल मीडिया, एक्स (ट्विटर) और रेडिट पर फिल्म को लेकर भारी बहस छिड़ी हुई है। आइए समझते हैं फिल्म की असली कहानी, इसका ट्रीटमेंट और जमीनी हकीकत।
1. क्या है फिल्म की कहानी? (बिना किसी स्पॉइलर के)
‘दायरा’ की पृष्ठभूमि साल 2019 के चर्चित हैदराबाद एनकाउंटर और देश भर में महिलाओं के खिलाफ हुए जघन्य अपराधों की वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है।
कहानी की शुरुआत 24 वर्षीय रागिनी पुजारी के साथ हाईवे पर हुए खौफनाक अपराध और हत्या से होती है। पूरे देश में गुस्सा फूट पड़ता है। डीसीपी रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) और उनकी टीम चार संदिग्धों को हिरासत में लेती है, लेकिन कुछ ही घंटों में खबर आती है कि चारों आरोपी पुलिस एनकाउंटर में मारे गए।
सड़कों पर आम जनता जश्न मनाती है और पुलिस पर फूलों की बारिश होती है। लेकिन इस कथित एनकाउंटर पर जब सवाल उठते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और इंटरनल विजिलेंस के तहत मामले की जांच सौंपी जाती है डीसीपी अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) को।
पूरी कहानी इसी एक नैतिक द्वंद्व पर आकर टिक जाती है—क्या त्वरित बदला ही असली न्याय है, या फिर न्याय केवल वही है जो संविधान और कानून के तय ‘दायरे’ में मिले?
2. सोशल मीडिया और दर्शकों का ग्राउंड रिएक्शन: कहाँ हुआ धोखा?
फिल्म को क्रिटिक्स से भले ही मिले-जुले रिव्यू मिले हों, लेकिन आम दर्शकों की प्रतिक्रिया पेड रेटिंग्स से काफी अलग है:
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फेस-ऑफ का बड़ा अभाव: ट्रेलर देखकर दर्शक मान रहे थे कि करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन के बीच जबरदस्त वैचारिक और ड्रामैटिक टकराव (Face-off) देखने को मिलेगा। लेकिन असल फिल्म में दोनों का सीधा आमना-सामना बेहद सीमित है। अधिकांश समय दोनों अपने-अपने केबिन, फाइलों और पूछताछ के अलग-अलग रास्तों पर चलते दिखते हैं।
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धीमी रफ्तार और बोरियत की शिकायत: 143 मिनट के रनटाइम में फिल्म कई जगह डाक्यूमेंट्री जैसी सुस्त पड़ जाती है। कई दर्शकों का कहना है कि इंटरवल के बाद स्क्रीनप्ले इतना खिंचता है कि यह किसी बड़े बजट के ‘क्राइम पेट्रोल’ एपिसोड जैसा प्रतीत होने लगता है।
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करीना के किरदार पर बंटी राय: जहाँ एक तबका करीना कपूर के संजीदा रोल की तारीफ कर रहा है, वहीं कई दर्शकों का मानना है कि डीसीपी अजूनी कोहली के सख्त किरदार में करीना पूरी तरह फिट नहीं बैठ पाईं और कुछ दृश्यों में उनका स्टारडम किरदार पर हावी दिखता है। साथ ही, कुछ दर्शकों ने यह भी रेखांकित किया कि उनका स्क्रीन टाइम उम्मीद से कम है।
3. एक्टिंग और डायरेक्शन: कौन पड़ा किस पर भारी?
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पृथ्वीराज सुकुमारन (वन मैन आर्मी): फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी पृथ्वीराज सुकुमारन हैं। डीसीपी रमन कुमार के रूप में उनकी आंखों का ठहराव, सिस्टम की लाचारी पर गुस्सा और एक दृढ़ पुलिस अफसर का बॉडी लैंग्वेज पर्दे पर छा जाता है। वे अपने किरदार को कोई मसीहा नहीं, बल्कि एक ऐसा इंसान बनाते हैं जो मानता है कि न्याय में देरी दरअसल न्याय से इनकार है।
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सपोर्टिंग कास्ट का असरदार काम: जितेंद्र जोशी, विश्वपति सरकार और पीड़िता की मां के रूप में क्षिती जोग ने शानदार अभिनय किया है। खासकर क्षिती जोग का दर्दनाक विलाप और लाचारी दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देती है।
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मेघना गुलज़ार का निर्देशन: मेघना गुलज़ार का विषय चयन हमेशा की तरह ईमानदार है। वे पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया की खामियों (एफआईआर दर्ज न करना, थानों के चक्कर कटवाना) को बेबाकी से दिखाती हैं। लेकिन इस बार उनका नैरेटिव इतना सपाट और क्लिनिकल हो गया है कि दर्शकों का फिल्म के साथ गहरा भावनात्मक जुड़ाव नहीं बन पाता।
4. फाइनल वर्डिक्ट: थियेटर जाएं या ओटीटी का इंतजार करें?
‘दायरा’ कोई 4.5 स्टार वाली थ्रिलर मास्टरपीस नहीं है। यह 2.5 से 3 स्टार के बीच की एक ऐसी सामाजिक-कानूनी ड्रामा फिल्म है, जिसका मुद्दा तो बेहद गंभीर और भारी है, लेकिन इसकी रफ्तार दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेती है।
यदि आपको धीमी गति से चलने वाली प्रक्रियात्मक और अदालती जांच शैली की फिल्में पसंद हैं, तो भी इसके लिए सिनेमाघर का महंगा टिकट लेने के बजाय इसके ओटीटी रिलीज का इंतजार करना एक समझदारी भरा फैसला होगा।
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रेटिंग: 2.5 / 5 स्टार
