समय भास्कर सिनेमा डेस्क | मुंबई | समीक्षक: Act Abhi
अगर आप इस वीकेंड बड़े पर्दे पर किसी रूह कंपा देने वाली लोककथा या रहस्यमयी थ्रिलर की उम्मीद में ₹400-₹500 का टिकट कटाने की सोच रहे हैं, तो दो मिनट रुक जाइए। सोशल मीडिया पर पीआर और मार्केटिंग की फौज चाहे जितने बड़े-बड़े दावे कर ले, लेकिन सिनेमाघरों से बाहर आ रही आम जनता इस वक्त अपना माथा पकड़कर बैठी है।
‘पंचायत’ जैसी जमीन से जुड़ी सीरीज बनाने वाले निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा, TVF और एकता कपूर के बैनर तले बनी ‘द व्वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ (The Vvaan: Force of the Forest) कागज़ पर जितनी महत्वाकांक्षी लग रही थी, पर्दे पर उतनी ही बड़ी गफलत साबित हुई है। मेकर्स ने सोचा था कि घने जंगल, लोक-देवी का रहस्य और बैकग्राउंड में डरावनी आवाजें डालकर वे ‘कांतारा’ जैसा करिश्मा दोहरा लेंगे। लेकिन वे यह भूल गए कि ‘कांतारा’ की ताकत उसकी अपनी मिट्टी, लोक-संस्कृति और आस्था की सच्ची ईमानदारी थी—न कि स्टूडियो के अंदर जबरन गढ़ा गया तमाशा।
1. क्या है बुनियादी कहानी?
फिल्म की कहानी मुंबई में रहने वाले एक कंस्ट्रक्शन इंजीनियर ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) और उसकी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों के बीच सब कुछ ठीक है, सिवाय इसके कि वे माता-पिता बनने की जद्दोजहद में फंसे हैं और सालों पहले एक दर्दनाक हादसे में अपना अजन्मा बच्चा खो चुके हैं।
महंगे आईवीएफ (IVF) इलाज के पैसों और खानदानी जमीन के विवाद को सुलझाने के लिए ऋषि, ममता और अपने व्लॉगर दोस्त वेद प्रकाश (मनीष पॉल) के साथ अपने पैतृक गांव ‘देवांचल’ लौटता है। गांव में सदियों पुरानी मान्यता है कि स्थानीय जंगल ‘देव वन’ साक्षात ‘वन देवी’ का पवित्र वास है, जहां सूरज ढलने के बाद कदम रखना सख्त मना है।
ऋषि एक पक्का तर्कवादी और नास्तिक है, जो इन सब बातों को अंधविश्वास मानता है। लेकिन जैसे ही जंगल के बीच से सड़क निकालने को लेकर गांव के विकास और परंपरा के बीच टकराव शुरू होता है, कहानी अंधविश्वास, लालच और अलौकिक ताकतों के जाल में उलझने लगती है।
2. कहाँ चूकी फिल्म: न्यूमेरोलॉजी, कच्चा सेटअप और बेतुके ट्रैक
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न्यूमेरोलॉजी का मोह और नकली जंगल: मेकर्स का अंधविश्वास तो टाइटल से ही झलक जाता है, जहाँ जंगल यानी ‘वान’ को अंकशास्त्र के चक्कर में डबल ‘V’ लगाकर ‘The Vvaan’ कर दिया गया। जिस जंगल को पर्दे पर एक रहस्यमयी और डरावने किरदार की तरह खड़ा होना चाहिए था, वह साफ तौर पर स्टूडियो के अंदर हरे परदों (Chroma Screen) और सस्ते वीएफएक्स की पैदाइश नजर आता है।
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शुरुआत में ही लॉजिक का कत्ल: जहाँ पहले पंद्रह मिनट में डर, रहस्य और लोककथा का सस्पेंस बनना चाहिए था, वहां शुरुआत में ही एक नीम-हकीम के पास पौरुष चूर्ण ढूंढने जैसा बेतुका सीन डाल दिया गया।
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मनीष पॉल का खिंचा हुआ कॉमिक ट्रैक: मनीष पॉल की कॉमिक टाइमिंग बुरी नहीं है, लेकिन पूरी फिल्म में उनका एक ही घिसा-पिटा चुटकुला चलता रहता है—घर की एक बुजुर्ग महिला (सुलभा आर्या) को बार-बार डायन समझना! यह ट्रैक हर पंद्रह मिनट में इतनी बार दोहराया गया है कि डरने या हंसने के बजाय दर्शकों को चिढ़ होने लगती है।
3. क्लाइमेक्स में लॉजिक का मर्डर: सुपरनैचुरल बना ‘शक्तिमान’
फिल्म का पहला हाफ कम से कम एक उम्मीद जगाता है, लेकिन इंटरवल के बाद स्क्रीनप्ले पूरी तरह पटरी से उतर जाता है।
स्थानीय विलेन के रूप में सुनील ग्रोवर (दीपक) की कास्टिंग बेहद बेमेल साबित हुई है। उनका किरदार जैसे ही खुलता है, कहानी पूरी तरह प्रेडिक्टेबल हो जाती है। सबसे बुरा हाल होता है क्लाइमेक्स में, जहाँ एक लोककथा थ्रिलर अचानक 90 के दशक के किसी सस्ते सुपरहीरो शो में तब्दील हो जाती है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और सुनील ग्रोवर तारों के सहारे हवा में लटककर ऐसे लड़ रहे हैं मानो ‘शक्तिमान’ का कोई पुराना एपिसोड चल रहा हो! गंभीर कहानी की उम्मीद में बैठे दर्शकों के सामने लॉजिक का पूरी तरह कत्ल कर दिया गया, ऊपर से हर थोड़ी देर में कहानी रोककर बेमतलब के गाने घुसा दिए जाते हैं।
4. एक्टिंग: तमन्ना की सादगी बनाम सिद्धार्थ का सपाटपन
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तमन्ना भाटिया: फिल्म में अगर कोई एक पहलू सबसे ज्यादा सुकून देता है, तो वह है तमन्ना भाटिया का अभिनय। एक तड़पती हुई मां और बिहार के महापर्व छठ पूजा की कठिन आस्था को उन्होंने बहुत सादगी और गरिमा के साथ पर्दे पर उतारा है।
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सिद्धार्थ मल्होत्रा: सिद्धार्थ स्क्रीन पर मजबूत दिखते हैं, लेकिन उनके चेहरे के भाव पूरी फिल्म में एक जैसे और सपाट रहते हैं। वे एक तर्कवादी शहरी इंजीनियर से आस्था के रक्षक बनने का जो सफर तय करते हैं, उसका इमोशनल ग्राफ राइटिंग की कमजोरी के चलते दर्शकों को छू नहीं पाता।
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सपोर्टिंग कास्ट: अनूप सोनी और श्वेता तिवारी जैसे मंझे हुए कलाकारों को स्क्रीन पर बहुत सीमित जगह दी गई है, जिससे उनके किरदार आधे-अधूरे रह जाते हैं।
5. फाइनल वर्डिक्ट: थियेटर जाएं या ओटीटी का इंतजार करें?
‘द व्वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ एक ऐसी फिल्म है जिसके पास छठ पूजा, वन देवी और भारतीय लोक परंपराओं का एक शानदार विचार मौजूद था। लेकिन ओवर-द-टॉप एक्शन, कमजोर वीएफएक्स, बेतुके कॉमिक ट्रैक्स और ढीले स्क्रीनप्ले ने इस बेहतरीन आइडिया की बलि चढ़ा दी।
अगर आप ‘कांतारा’ या ‘तुम्बाड’ जैसी किसी रूहदार और जमीनी थ्रिलर की उम्मीद लेकर टिकट ले रहे हैं, तो यह फिल्म आपको सिर्फ सिरदर्द देगी। सिनेमाघरों का भारी-भरकम खर्च करने के बजाय इसके ओटीटी पर आने का इंतजार करना ही सबसे समझदारी भरा फैसला होगा।
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रेटिंग: 2 / 5 स्टार
