Samay Bhaskar Desk | Delhi
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ी कानूनी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने उनके खिलाफ कथित आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही सभी कार्यवाहियों पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्रीय जांच एजेंसियों—सीबीआई (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED)—को सख्त निर्देश दिया है कि वे इस मामले में अपनी कोई भी प्रगति रिपोर्ट हाई कोर्ट या किसी अन्य अथॉरिटी के समक्ष दाखिल न करें।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की पीठ ने राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
अदालती कार्यवाही और ‘प्राकृतिक न्याय’ पर सीजेआई की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक प्रक्रिया और निष्पक्षता पर जोर देते हुए एक अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि पुलिस या किसी जांच एजेंसी के पास कोई ठोस आधार है, तो वह कानून के अनुसार किसी के भी खिलाफ मामला दर्ज करने और जांच करने के लिए स्वतंत्र है। इसके लिए उन्हें अदालत की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
हालांकि, सीजेआई ने स्पष्ट किया कि जब कोई संवैधानिक अदालत (जैसे हाई कोर्ट) सीधे किसी एजेंसी को जांच या सत्यापन के निर्देश जारी करती है, तो अदालत से ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ (Principles of Natural Justice) का अनिवार्य रूप से पालन करने की उम्मीद की जाती है। पीठ ने माना कि हाई कोर्ट ने आरोपी पक्ष का पक्ष सुने बिना ही आदेश जारी कर दिए थे।
इन-कैमरा प्रोसीडिंग्स और सीलबंद लिफाफे पर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल का विरोध
राहुल गांधी की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अधिवक्ता प्रसन्ना एस. ने हाई कोर्ट की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर प्रक्रियागत सवाल उठाए।
सिब्बल ने दलील दी कि इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में इस मामले की सुनवाई खुली अदालत में होने के बजाय ‘इन-कैमरा’ (बंद कमरे में) की गई। इसके अलावा, सभी जवाबों और दस्तावेजों को ‘सीलबंद लिफाफे’ में रखा जा रहा था, जिससे उनके मुवक्किल के नागरिक अधिकारों और प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा।
सिब्बल ने इसे पूरी तरह से एक “विच-हंट” करार देते हुए कहा कि किसी निजी शिकायतकर्ता की अर्जी पर बिना प्राथमिक अपराध (Predicate Offence) दर्ज किए ईडी और सीबीआई से खुली जांच कराना कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है। साथ ही, उन्होंने इस पूरे मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट से दिल्ली हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने की भी मांग रखी।
जस्टिस बागची ने केंद्रीय एजेंसियों से पूछा- “अब तक क्यों शांत थीं एजेंसियां?”
सुनवाई के दौरान जब केंद्रीय एजेंसियों का पक्ष रख रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने कहा कि शिकायत में लगे आरोप गंभीर हैं और वे केवल तथ्यों का सत्यापन कर रहे हैं, तो बेंच ने कड़ा रुख अपनाया।
पीठ के सदस्य जस्टिस जोयमाल्या बागची ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि आरोप इतने गंभीर थे, तो एजेंसियां अब तक चुप क्यों बैठी थीं? क्या जांच शुरू करने के लिए भी एजेंसियों को अदालत के आदेश या धक्के की आवश्यकता पड़ती है? जब सीबीआई ने खुद संज्ञान लेकर कोई मामला दर्ज नहीं किया, तो हाई कोर्ट के सीधे जांच निर्देश देने के औचित्य की समीक्षा शीर्ष अदालत को करनी होगी।
शिकायतकर्ता का पक्ष और केस का बैकग्राउंड
यह मामला कर्नाटक निवासी सामाजिक कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर द्वारा दायर एक याचिका से उपजा है, जिसमें उन्होंने राहुल गांधी पर अपनी घोषित आय से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस पर सीबीआई और ईडी से रिपोर्ट मांगी थी और 20 अगस्त 2026 को अगली सुनवाई तय की थी।
सुप्रीम कोर्ट में वर्चुअल रूप से पेश हुए शिकायतकर्ता ने राहुल गांधी की अर्जी का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि एफआईआर से पहले के चरण (Pre-FIR Stage) में आरोपी को सुनवाई का वैधानिक अधिकार नहीं होता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता, सीबीआई और ईडी को नोटिस जारी करते हुए हाई कोर्ट में 20 अगस्त को होने वाली सुनवाई को अगले आदेश तक टालने का निर्देश दे दिया है।
