Samay Bhaskar Cinema Desk | Mumbai

15 अगस्त 1975 को जब देश के सिनेमाघरों में निर्देशक रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’ रिलीज हुई थी, तो शुरुआती दो हफ्तों तक फिल्म समीक्षकों और बॉक्स ऑफिस पंडितों ने इसे एक सिरे से नकार दिया था। उस दौर के अखबारों और फिल्मी पत्रिकाओं में बड़े-बड़े अक्षरों में छप चुका था कि 3 करोड़ रुपये के भारी बजट में बनी यह फिल्म एक बड़ी ‘डिजास्टर’ यानी महाफ्लॉप साबित हो चुकी है।

आज 51 साल बीत जाने के बाद भी हम सब जय-वीरू की अटूट दोस्ती, गब्बर सिंह के खौफ, बसंती की बेबाकी, ठाकुर के बदले और अमिताभ बच्चन की ऑन-स्क्रीन शहादत पर गर्व करते हैं। लेकिन इस 70mm के विशाल परदे के पीछे जो कुछ घटा, अगर उसका एक भी पन्ना इधर-उधर हो जाता, तो आज भारतीय सिनेमा का इतिहास कुछ और ही होता।

अकीरा कुरोसावा की मास्टरपीस ‘सेवन समुराई’ और हॉलीवुड क्लासिक्स ‘द मैग्निफिसेंट सेवन’ व ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन द वेस्ट’ से प्रेरित यह फिल्म भारतीय जनमानस का अटूट हिस्सा कैसे बनी, आइए चलते हैं शोले के उसी ऐतिहासिक सफर पर जहाँ हर मोड़ पर एक नया ड्रामा और कड़ा इम्तिहान था।

1. कास्टिंग की हड़बड़ाहट और गब्बर सिंह की खोज का संकट

इस पूरे ड्रामे की शुरुआत होती है कास्टिंग की उस घबराहट से, जिसने सिप्पी कैंप की रातों की नींद उड़ा दी थी। शूटिंग शुरू होने में एक महीने से भी कम का वक्त बचा था और मेकर्स की पहली पसंद डैनी डेन्जोंगपा ने ऐन वक्त पर फिरोज खान की फिल्म ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग के लिए अफगानिस्तान जाना तय कर लिया। डैनी के शोले छोड़ते ही मेकर्स के सामने एक गहरा संकट खड़ा हो गया कि आखिर भारतीय सिनेमा का सबसे खूंखार विलेन ‘गब्बर सिंह’ कौन बनेगा?

निर्देशक रमेश सिप्पी और निर्माता जी. पी. सिप्पी ने उस दौर के ख्यात खलनायकों रंजीत और प्रेम चोपड़ा के नामों पर गंभीरता से विचार किया। रंजीत के नाम पर तो लगभग मुहर लग ही गई थी, लेकिन रमेश सिप्पी के दिल को पूरी तसल्ली नहीं मिल रही थी। सिप्पी इतने बेबस हो चुके थे कि वे दिग्गज अभिनेता प्रेमनाथ जी के नाम तक पर विचार करने लगे। लेकिन बड़े स्टार्स के संभावित ईगो क्लैश और मुश्किल मिजाज के डर से उस ख्याल को भी छोड़ना पड़ा।

2. बांद्रा के बैंडस्टैंड से गब्बर की एंट्री: अमजद खान की किस्मत का मोड़

तभी किस्मत ने एक ऐसा अप्रत्याशित मोड़ लिया जिसने एक अनजान थिएटर आर्टिस्ट की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। बांद्रा के बैंडस्टैंड इलाके में एक शाम इत्तेफाक से मशहूर लेखक सलीम खान की मुलाकात अमजद खान से हुई। सलीम साहब पहले ही एक नाटक में अमजद की बेजोड़ अभिनय प्रतिभा देख चुके थे। उन्होंने अमजद से साफ कहा कि वे कोई झूठा वादा नहीं करेंगे, लेकिन एक बहुत बड़ी फिल्म में बेहद दमदार रोल खाली है और वे उन्हें सीधे डायरेक्टर से मिलवाएंगे शु।

अमजद को तुरंत ऑफिस बुलाया गया और उन्हें अपनी दाढ़ी बढ़ाने का निर्देश दिया गया। जब सिप्पी कैंप में यह बात फंसी कि एक बिल्कुल अनजान चेहरे पर इतना बड़ा वित्तीय दांव कैसे लगाया जाए, तो उसी दिन ऑफिस में मौजूद चरित्र अभिनेता सत्येन कप्पू (जिन्होंने फिल्म में ठाकुर के वफादार ‘रामलाल’ का किरदार निभाया) ने अमजद की वकालत की। सलीम खान के पूछने पर सत्येन कप्पू ने निसंकोच कहा कि अमजद उनसे कहीं बेहतर एक्टर हैं, युवा हैं और उनकी सोच एकदम फ्रेश है।

सिप्पीज के ऑफिस के बगीचे में अमजद खान का स्क्रीन टेस्ट हुआ। अमजद पूरी तरह बढ़ी हुई दाढ़ी और दांतों को काला करके पहुँचे थे। जैसे ही उन्होंने संवाद बोले, मेकर्स दंग रह गए और 20 सितंबर 1973 को उन्हें आधिकारिक तौर पर गब्बर के ऐतिहासिक रोल के लिए साइन कर लिया गया। अमजद अनुबंध साइन करते ही सीधे अस्पताल की ओर भागे, क्योंकि ठीक उसी दिन उनकी पत्नी शैला ने बेटे शादाब खान को जन्म दिया था।

3. आवाज पर उठा बखेड़ा और 11 हजार रुपये की फीस

अमजद खान के साइन होते ही प्रोडक्शन में एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया। खुद लेखक जोड़ी सलीम-जावेद को कुछ समय बाद लगने लगा कि अमजद की आवाज काफी पतली और कमजोर है, जो बीहड़ के एक भारी-भरकम और खूंखार डाकू के किरदार पर बिल्कुल सूट नहीं करेगी। उन्हें बदलने तक की चर्चाएं चलने लगीं।

पर समय का चक्र देखिए, फिल्म रिलीज होने के बाद उसी खास आवाज में गूंजने वाले डायलॉग्स के ऑडियो कैसेट्स ने पूरे देश में बिक्री के सारे ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ दिए।

इधर पर्दे के पीछे ‘जय’ के शांत और संजीदा किरदार को लेकर भी कम खींचतान नहीं थी। इस रोल के लिए पहले शत्रुघ्न सिन्हा लगभग तय माने जा रहे थे, लेकिन धर्मेंद्र ने अपने करीबी दोस्त अमिताभ बच्चन के लिए रमेश सिप्पी से जोरदार पैरवी की। अमिताभ ने खुद मेकर्स के दफ्तरों के कई चक्कर काटे और आखिरकार यह रोल हासिल किया।

मगर नियति की विडंबना देखिए कि जिस गब्बर सिंह के डायलॉग्स के दम पर फिल्म हमेशा के लिए अमर हुई, उस अमजद खान को इस कालजयी रोल के लिए कुल जमा 11,000 रुपये की फीस मिली थी, जबकि फिल्म के बाकी स्थापित सितारों को लाखों रुपये दिए गए थे।

4. रमेश सिप्पी का परफेक्शन: 20 दिन में एक सीन और सांभा के 27 फेरे

कास्टिंग की जंग जीतने के बाद कर्नाटक के रामनगर में बने विशाल सेट पर शुरू हुआ निर्देशक रमेश सिप्पी के परफेक्शन का असली इम्तिहान। फिल्म का वो बेहद संजीदा और आइकॉनिक सीन याद कीजिए, जहाँ ढलते सूरज की पृष्ठभूमि में राधा (जया बच्चन) हवेली के बरामदे में एक-एक करके लालटेन बुझाती हैं और सामने बालकनी में बैठकर जय (अमिताभ बच्चन) माउथ ऑर्गन की उदास धुन बजाता है।

उस महज चंद सेकेंड्स के सीन को पूरी तरह कैमरे में कैद करने में पूरे 20 दिन का वक्त लग गया था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि रमेश सिप्पी इसे केवल ‘मैजिक ऑवर’ यानी सूर्यास्त के ठीक बाद की असली कुदरती रोशनी में ही शूट करना चाहते थे, जो प्रकृति में दिनभर में केवल 2 से 3 मिनट के लिए ही मिलती थी।

परफेक्शन का यह जुनून सिर्फ मुख्य कलाकारों तक सीमित नहीं था। गब्बर के वफादार साथी ‘सांभा’ का किरदार निभाने वाले अभिनेता मैक मोहन ने भी अपना सब कुछ झोंक दिया। पूरी साढ़े तीन घंटे की फिल्म में सांभा का सिर्फ एक ही अमर संवाद था—“पूरे पचास हजार”

मगर इस इकलौती लाइन और चट्टान पर बैठे चंद सेकेंड्स के क्लोज-अप शॉट के लिए मैक मोहन को मुंबई से बेंगलुरु के रामनगर सेट पर पूरे 27 बार फ्लाइट से आना-जाना पड़ा था।

5. रामनगर सेट का असली रोमांस और धर्मेंद्र की 500 रुपये की टिप

शूटिंग की इसी आपाधापी के बीच सेट पर एक ऐसा हकीकी रोमांस परवान चढ़ रहा था जो आगे चलकर बॉलीवुड का इतिहास बन गया। धर्मेंद्र और हेमा मालिनी का असली प्यार इसी शोले के सेट परवान चढ़ा। धर्मेंद्र शूटिंग के दौरान जानबूझकर रोमांटिक सीन्स में गलतियां करते थे ताकि शॉट ओके न हो और बार-बार रीटेक की नौबत आए।

धर्मेंद्र सेट के लाइट बॉयज को 100 से लेकर 500 रुपये तक की गुप्त टिप दिया करते थे ताकि वे रिफ्लेक्टर जानबूझकर गलत दिशा में घुमा दें। इससे शॉट कट होता और धर्मेंद्र को बसंती यानी हेमा मालिनी को रिवॉल्वर चलाना सिखाने के बहाने बार-बार गले लगाने का मौका मिल जाता था।

6. सेट पर खौफनाक हादसा: जब अमिताभ बच्चन के कान को छूकर निकली असली गोली

मस्ती और रोमांस के इसी माहौल के बीच एक दिन सेट पर ऐसा खौफनाक हादसा घटा जिसने पूरे यूनिट की सांसें हलक में अटका दी थीं। क्लाइमेक्स की शूटिंग चल रही थी, जहाँ जय और वीरू चट्टानों के बीच घिरे होते हैं। एक सीन में धर्मेंद्र को नीचे रखे बक्से से गोलियां निकालकर अपनी बंदूक में तेजी से लोड करके फायर करना था।

धर्मेंद्र सीन के रोमांच और उत्तेजना में इतने खो गए कि उन्होंने आवेश में आकर डमी कारतूस के बजाय बंदूक में असली गोली लोड कर दी और ट्रिगर दबा दिया। वह असली गोली अमिताभ बच्चन के कान के ठीक पास से हवा को चीरती हुई सनसनाती निकल गई। अमिताभ उस वक्त चट्टान पर खड़े थे; अगर वे अपनी जगह से महज एक इंच भी इधर-उधर हिले होते, तो भारतीय सिनेमा में एक बहुत बड़ी और दर्दनाक त्रासदी तय थी।

7. रिश्तों की तल्खी: क्यों नहीं हुआ ठाकुर और बसंती का कोई साझा सीन?

सेट पर खतरा सिर्फ बंदूकों से नहीं था, बल्कि कलाकारों के आपसी निजी रिश्तों की कड़वाहट भी हवा में तैर रही थी। शोले की शूटिंग शुरू होने से कुछ ही समय पहले महान अभिनेता संजीव कुमार ने हेमा मालिनी को शादी का औपचारिक प्रपोजल दिया था, जिसे हेमा ने साफ ठुकरा दिया था।

इसके चलते दोनों के रिश्ते में काफी खटास आ चुकी थी। हेमा मालिनी के परिवार की मेकर्स के सामने यह बेहद सख्त शर्त थी कि फिल्म में संजीव कुमार और हेमा मालिनी का कोई भी साझा सीन न रखा जाए। यही ऐतिहासिक कारण है कि पूरी फिल्म में ठाकुर बलदेव सिंह और बसंती कभी भी एक फ्रेम में आमने-सामने बात करते नजर नहीं आते।

8. इमरजेंसी का चाबुक और बदला हुआ क्लाइमेक्स

जब सालों की कड़ी मेहनत के बाद फिल्म बनकर तैयार हुई, तो तत्कालीन सरकारी सिस्टम और सेंसरशिप के दबाव ने इस कहानी का असली अंत ही बदल कर रख दिया।

  • ओरिजिनल क्लाइमेक्स: रमेश सिप्पी द्वारा शूट किए गए मूल क्लाइमेक्स में ठाकुर अपने दोनों कटे हाथों के बदले अपने नुकीले जूतों से गब्बर सिंह की छाती को बेरहमी से कुचलकर उसे जान से मार देता है।

  • सेंसर बोर्ड की आपत्ति: लेकिन उस समय 1975 में देश में राष्ट्रीय आपातकाल (इमरजेंसी) लागू हो चुका था। सेंसर बोर्ड ने कड़ा एतराज जताते हुए साफ कह दिया कि वर्दी से रिटायर हुए एक पूर्व पुलिस अधिकारी को कानून अपने हाथ में लेकर न्याय करते नहीं दिखाया जा सकता।

भारी मन और निराशा के साथ मेकर्स को दोबारा रामनगर जाकर क्लाइमेक्स री-शूट करना पड़ा, जिसमें ऐन वक्त पर पुलिस की गाड़ी आती है और गब्बर सिंह को कानून के हवाले यानी गिरफ्तार दिखाया जाता है।

9. मिनर्वा थिएटर का 5 साल का अटूट रिकॉर्ड और 15 करोड़ की कमाई

रिलीज के शुरुआती दो हफ्तों में जब फिल्म टिकट खिड़की पर सुस्त रही, तो मेकर्स इतने घबरा गए थे कि उन्होंने मीटिंग बुलाकर गब्बर को मारने वाला पुराना ओरिजिनल क्लाइमेक्स दोबारा जोड़ने पर विचार शुरू कर दिया था। लेकिन तीसरे हफ्ते से फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच ऐसा अभूतपूर्व ‘वर्ड ऑफ माउथ’ फैला कि देश भर के थिएटर्स के बाहर मीलों लंबी कतारें लग गईं।

मात्र 3 करोड़ रुपये की लागत से बनी इस फिल्म ने उस दौर में 15 करोड़ रुपये से अधिक का ऐतिहासिक नेट बॉक्स ऑफिस कलेक्शन किया। मुंबई का प्रतिष्ठित मिनर्वा थिएटर उस समय भारत का सबसे आधुनिक सिनेमाघर था, जो 70mm के विशाल पर्दे और स्टीरियोफोनिक साउंड सिस्टम से लैस था। लोग मीलों दूर से सिर्फ 70mm स्क्रीन पर शोले का अनुभव लेने मुंबई आते थे।

मिनर्वा में शोले लगातार 5 साल (लगातार 286 हफ्ते) तक चलने का अटूट कीर्तिमान बना चुकी है। साल 2004 में जब अपनी रिलीज के पूरे 29 साल बाद शोले को दोबारा मिनर्वा थिएटर में प्रदर्शित किया गया, तब भी इसके सभी मैटिनी शोज़ पूरी तरह ‘हाउसफुल’ चल रहे थे, जबकि उसी दौर में रिलीज हुई कई बड़ी नई बॉलीवुड फिल्में खाली पड़े सिनेमाघरों में दम तोड़ रही थीं।

10. एडिटर एम. एस. शिंदे: 3 लाख फीट रील तराशने वाले की गुमनाम दास्तान

इस सुनहरे और ऐतिहासिक सफर का सबसे दर्दनाक और स्याह सच छुपा है उस शख्स की जिंदगी के पीछे, जिसने पर्दे के पीछे रहकर इस पूरी फिल्म को तराशा था। फिल्म के मुख्य एडिटर एम. एस. शिंदे (M. S. Shinde) ने लगभग 3,00,000 फीट की विशाल रफ फुटेज को दिन-रात एक करके काटा और उसे 18,000 फीट (लगभग 3 घंटे 20 मिनट) की इस कालजयी फिल्म में तब्दील किया।

विडंबना देखिए कि साल 1976 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में तमाम नॉमिनेशन्स के बावजूद शोले को पूरी इंडस्ट्री से केवल एक इकलौता अवॉर्ड मिला था, और वह अवॉर्ड बेस्ट एडिटिंग के लिए एम. एस. शिंदे को ही मिला था। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिस इंसान ने भारतीय सिनेमा को उसकी सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर तराश कर दी, उसने अपनी जिंदगी के अंतिम दिन मुंबई के धारावी स्लम की एक तंग और अंधेरी खोली में, घोर मुflisi, गुमनामी और बेबसी के आलम में काटे।

शोले केवल सिल्वर स्क्रीन पर चलने वाली साढ़े तीन घंटे की फिल्म नहीं है, बल्कि यह इंसानी जज्बातों, कभी न हार मानने वाले संघर्ष, परफेक्शन के पागलपन और मुकद्दर के खेल की वो अनोखी दास्तान है जो सदियों में सिर्फ एक बार बनती है।

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