Samay Bhaskar Desk | Delhi
संसद के मानसून सत्र में पेश किए गए ‘विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026′ (FCRA Amendment Bill) को लेकर राजनीतिक गलियारों और गैर-सरकारी संगठनों में तीखी बहस छिड़ी हुई है। लोकसभा में पेश होने के बाद से ही इस बिल को विपक्ष और सामाजिक संस्थाओं के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। विपक्ष के लगातार विरोध और व्यापक विचार-विमर्श की मांग को देखते हुए सरकार ने इस विधेयक को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी (JPC) के पास भेजने का फैसला किया है। संसद के दोनों सदनों ने इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है।
क्या है FCRA कानून और नए संशोधन का उद्देश्य?भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक, शैक्षणिक और चैरिटेबल ट्रस्टों को मिलने वाली विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) लागू है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि विदेशी धन का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए हो, जिसके लिए वह प्राप्त हुआ है। साल 2026 के इस संशोधन विधेयक के जरिए सरकार विदेशी फंड से बनने वाली संपत्तियों के प्रबंधन को और अधिक पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाना चाहती है। सरकार का तर्क है कि जब कोई संस्था अपना पंजीकरण खो देती है, तो उस फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन में आने वाली दिक्कतों को दूर करना जरूरी है।
नामित अधिकारी’ और संपत्ति अधिग्रहण पर क्यों मचा है घमासान?इस विधेयक में सबसे बड़ा विवाद प्रस्तावित ‘नामित अधिकारी’ (Designated Authority) के प्रावधान को लेकर है। बिल के नियमों के अनुसार, यदि किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द होता है, समाप्त होता है या उसका नवीनीकरण नहीं किया जाता, तो उस संस्था की विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का नियंत्रण इस नामित अधिकारी के हाथ में चला जाएगा। यदि तय समय सीमा के भीतर रजिस्ट्रेशन बहाल नहीं होता है, तो सरकार के पास यह अधिकार होगा कि वह इन संपत्तियों को किसी सरकारी विभाग को सौंप दे या जनहित में इनका निस्तारण कर दे। विपक्ष और आलोचकों का कहना है कि कई संगठन घरेलू और विदेशी दोनों तरह के फंड मिलाकर स्कूल या अस्पताल जैसी संपत्तियां बनाते हैं। ऐसे में पूरी संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण से संस्थाओं के अधिकारों का हनन हो सकता है।
पूर्वोत्तर राज्यों और सामाजिक संस्थाओं की चिंताएं
इस विधेयक के प्रावधानों को लेकर पूर्वोत्तर भारत के राज्यों, विशेष रूप से नागालैंड, मिजोरम और मेघालय जैसे क्षेत्रों के नेतृत्व और विभिन्न धार्मिक संस्थाओं ने अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। उनका मानना है कि दूरदराज के इलाकों में चल रहे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी कल्याणकारी कार्यों पर इन कड़े नियमों का विपरीत असर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ, सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि यह कानून किसी भी विशेष समुदाय या संस्था के खिलाफ नहीं है। सरकार का पक्ष है कि देश की आंतरिक सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और विदेशी फंडिंग के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य है।
JPC में क्या होगा आगे का रास्ता?
इस 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति में 21 सदस्य लोकसभा से और 10 सदस्य राज्यसभा से शामिल किए गए हैं। यह समिति अब विधेयक के प्रत्येक क्लॉज का तकनीकी विश्लेषण करेगी और सभी हितधारकों तथा नागरिक संगठनों से सुझाव लेगी। समिति को आगामी शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट संसद के समक्ष पेश करने का समय दिया गया है। इसके बाद ही तय होगा कि इस कानून में कौन-से संशोधन शामिल किए जाते हैं।
