Samay Bhaskar Cinema Desk | Mumbai

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे हैं जो सिर्फ सुने नहीं जाते, बल्कि श्रोताओं के दिलों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। साल 1960 में आई फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ का सदाबहार गीत “अजीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू कहाँ ख़तम…” एक ऐसा ही संगीत का शाहकार है।

इस गाने की धुनों में जितना दर्द और क्लासिक संगीत का खिंचाव है, उतनी ही दिलचस्प इसके रिकॉर्ड होने, ऑल इंडिया रेडियो पर बैन होने और फिल्मफेयर इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर करने की कहानी है।

जब वेस्टर्न वॉल्ट्ज़ और भारतीय राग पहाड़ी का हुआ मेल
फिल्म के निर्देशक किशोर साहू को अपनी कहानी के एक बेहद अहम सीन के लिए ऐसे गाने की तलाश थी जो एक पार्टी के माहौल के बीच मुख्य अभिनेत्री मीना कुमारी के सीने में दबे अकेलेपन और गहरे दर्द को बयाँ कर सके।

इस चुनौती को पूरा करने के लिए उस दौर की मशहूर संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन और गीतकार शैलेंद्र ने एक अनूठा प्रयोग करने का फैसला किया। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग पहाड़ी के सुरों का चुनाव किया और उसे 6 मात्राओं वाली दादरा ताल तथा वेस्टर्न ‘वॉल्ट्ज़’ (Waltz) रिदम पर सेट कर दिया।

गाने में पानी की लहरों का अहसास कराने के लिए म्यूजिशियन गुड्डी सीरवाई ने अकॉर्डियन पर एक खास धुन बजाई। इस गाने की धुन की प्रेरणा हॉलीवुड सिंगर जिम रीव्स के प्रसिद्ध ट्रैक ‘माई लिप्स आर सील्ड’ से भी प्रभावित बताई जाती है।

लता मंगेशकर की सुरीली आवाज़ और मीना कुमारी की खामोशी
जब लता मंगेशकर रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो पहुँचीं, तो उन्होंने निर्देशक से दृश्य का पूरा बैकग्राउंड समझा। गाने के भाव को सटीक रूप से उभारने के लिए उन्होंने बेहद संतुलित और धीमी सांसों के साथ माइक के करीब जाकर इसे गाया।

फिल्म के पर्दे पर यह गाना केरल के बैकवाटर्स में एक सजी हुई नाव पर फिल्माया गया था। एक तरफ खुश होकर झूमती नादिरा और दूसरी तरफ राजकुमार के साथ खड़े होकर अपने दर्द को छिपाती मीना कुमारी की खामोश आँखों ने लता जी की आवाज़ के साथ मिलकर स्क्रीन पर एक भावुक माहौल रच दिया।

क्लर्क की गलती से ऑल इंडिया रेडियो पर लगा था बैन
गाने की रिलीज़ के बाद ऑल इंडिया रेडियो (AIR) के दफ़्तर में एक अजीबोगरीब वाकया हुआ। सेंसरशिप और सरकारी प्रक्रियाओं के उस दौर में, रेडियो ऑफिस के एक क्लर्क ने प्रशासनिक चूक के कारण रिकॉर्ड डिस्क के गलत साइड पर “Not Approved” का स्टिकर चिपका दिया।

इस मानवीय गलती के कारण यह सुपरहिट गाना ऑल इंडिया रेडियो पर बैन हो गया। हालांकि, संगीत प्रेमियों की दीवानगी नहीं रुकी और लोगों ने पड़ोसी देश से प्रसारित होने वाले ‘रेडियो सीलोन’ पर इसे सुन-सुनकर महीनों तक नेशनल चार्टबस्टर बनाए रखा।

1961 का फिल्मफ़ेयर अपसेट: ‘मुग़ल-ए-आज़म’ को पीछे छोड़ जीता बेस्ट म्यूज़िक
इस गाने की सफलता का सबसे ऐतिहासिक मोड़ साल 1961 के फिल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स में आया। उस साल हर कोई मानकर चल रहा था कि के. आसिफ की भव्य फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के लिए संगीतकार नौशाद साहब का सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक (Best Music Director) का पुरस्कार जीतना लगभग तय है।

लेकिन जब लिफाफा खुला, तो पूरा हॉल हैरान रह गया। जनता की भारी वोटिंग और गानों की रिकॉर्ड बिक्री के दम पर ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ के लिए शंकर-जयकिशन ने नौशाद साहब की ‘मुग़ल-ए-आज़म’ को पछाड़कर फिल्मफ़ेयर का सबसे बड़ा अपसेट दर्ज किया। आज भी यह गाना बीबीसी एशियन नेटवर्क की ऑल-टाइम 100 महानतम बॉलीवुड गानों की सूची में अपना प्रमुख स्थान रखता है।

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