महिला की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर उठे सवाल, शिकायतों और नोटिसों के बावजूद चलता रहा कथित क्लीनिक
फिरोजाबाद। जलेसर रोड स्थित झील की पुलिया के पास संचालित एक कथित अवैध क्लीनिक में पांच दिन तक इलाज के बाद 40 वर्षीय महिला की मौत ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुस्साए परिजनों ने क्लीनिक के बाहर शव रखकर हंगामा किया और चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाया। घटना के बाद अब सवाल केवल महिला की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी उठ रहा है कि शिकायतों, नोटिसों और पंजीकरण को लेकर उठे संदेह के बावजूद संबंधित क्लीनिक के खिलाफ समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
मृतका की पहचान अंगूरी देवी (40 वर्ष) निवासी झलकारी नगर, थाना उत्तर, फिरोजाबाद के रूप में हुई है। परिजनों के अनुसार वह पिछले पांच दिनों से उक्त क्लीनिक में भर्ती थीं। मृतका के पति का आरोप है कि इस दौरान करीब 40 बोतल ग्लूकोज और विभिन्न दवाएं चढ़ाई गईं, लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। उनका कहना है कि उन्होंने कई बार पत्नी को डिस्चार्ज कर किसी बड़े अस्पताल ले जाने की बात कही, लेकिन चिकित्सक ने उन्हें छुट्टी नहीं दी। अंततः इलाज के दौरान ही उनकी मौत हो गई।
महिला की मौत की सूचना मिलते ही परिजन और स्थानीय लोग क्लीनिक पहुंच गए। आक्रोशित लोगों ने शव क्लीनिक के बाहर रखकर विरोध प्रदर्शन किया और संबंधित चिकित्सक के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और लोगों को समझाकर स्थिति को नियंत्रित किया।
घटना के बाद करीब एक वर्ष पुराने नोटिस भी चर्चा में आ गए हैं। सूत्रों के अनुसार नोडल अधिकारी डॉ. कमल किशोर वर्मा ने क्लीनिक संचालक डॉ. एवरन सिंह को दो बार नोटिस जारी कर पंजीकरण संबंधी अभिलेख प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। आरोप है कि नोटिसों का जवाब नहीं मिलने के बावजूद क्लीनिक के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
सूत्रों का यह भी दावा है कि उक्त क्लीनिक के संबंध में मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई गई थी। विभिन्न समाचार पत्रों में भी समय-समय पर खबरें प्रकाशित हुईं, लेकिन कथित तौर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। एक आरटीआई कार्यकर्ता ने स्वास्थ्य विभाग एवं आयुर्वेदिक विभाग से क्लीनिक के पंजीकरण और उसके विरुद्ध की गई कार्रवाई से संबंधित सूचनाएं मांगीं, लेकिन आरोप है कि आज तक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग और आयुर्वेदिक विभाग लंबे समय तक इस मामले में एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे, जिसके चलते कथित अवैध क्लीनिक का संचालन जारी रहा। कुछ सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि क्लीनिक प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में संचालित हो रहा था। हालांकि, इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और इसकी जांच होना बाकी है।
महिला की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम ने आनन-फानन में मौके पर पहुंचकर क्लीनिक को सील कर दिया। अब सवाल उठ रहा है कि यदि क्लीनिक के विरुद्ध कार्रवाई की गुंजाइश पहले से थी, तो मौत के बाद ही विभाग क्यों जागा? लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई की जाती तो शायद यह घटना टाली जा सकती थी।
हालांकि, महिला की मौत के कारण, इलाज में लापरवाही, क्लीनिक की वैधता तथा शिकायतों पर विभागीय कार्रवाई से जुड़े सभी तथ्यों की पुष्टि पुलिस एवं संबंधित विभागों की जांच के बाद ही हो सकेगी। फिलहाल पूरा मामला जांच के अधीन है।
स्वास्थ्य विभाग का पक्ष
मामले में स्वास्थ्य विभाग का पक्ष जानने के लिए नोडल अधिकारी डॉ. कमल किशोर वर्मा से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।
वहीं क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ. शरद वर्मा ने बताया कि महिला की मौत की जानकारी संज्ञान में नहीं है। क्लीनिक के पंजीकरण के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 के बाद उन्होंने अपना पंजीकरण नवीनीकरण नहीं कराया है।
महिला की मौत और उसके बाद हुई कार्रवाई ने एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था, कथित अवैध क्लीनिकों पर नियंत्रण, शिकायतों के निस्तारण और विभागीय जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यदि जांच में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल चिकित्सकीय लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विभागीय लापरवाही और जवाबदेही का भी विषय बन सकता है।
