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फिल्म: धड़क 2. निर्देशक: शज़िया ज़ाहिद इकबाल कलाकार: सिद्धांत चतुर्वेदी, तृप्ति डिमरी. रेटिंग: ⭐⭐ (2/5)
करण जौहर की धड़क 2 आखिरकार बड़े परदे पर आ गई है। जब पहली ‘धड़क’ आई थी, तो उसने एक प्रेम कहानी को एक दर्दनाक मोड़ पर खत्म किया था। इस बार, फिल्म का दावा था कि यह जातिगत भेदभाव जैसे गंभीर मुद्दे को उठाएगी। लेकिन, क्या यह अपनी बात कह पाती है या सिर्फ ऊपरी दिखावे में रह जाती है?
कहानी: जाति और अधूरे इश्क का बोझ
फिल्म की कहानी नीलेश (सिद्धांत चतुर्वेदी) से शुरू होती है, जो एक दलित परिवार से है और अपनी माँ का सपना पूरा करने के लिए लॉ की पढ़ाई कर रहा है। वह अपनी जाति की वजह से समाज और कॉलेज में कई बार अपमान झेलता है। इसी बीच उसकी मुलाकात कॉलेज में पढ़ने वाली विधि (तृप्ति डिमरी) से होती है, जो ऊँची जाति से है। विधि नीलेश के साथ बराबरी का व्यवहार करती है और धीरे-धीरे दोनों में प्यार हो जाता है।
कहानी में कई ऐसे सीन हैं जो आपको झकझोर देते हैं—जैसे नीलेश के पालतू कुत्ते को मार देना, उसकी माँ को सबके सामने थप्पड़ मारना, और नीलेश को कीचड़ से सना देना। ये सब हमें समाज की कड़वी सच्चाई दिखाते हैं।
लेकिन, यही से फिल्म की दिक्कतें शुरू होती हैं। फिल्म में जातिगत भेदभाव को इतना बार-बार और एक ही तरह से दिखाया गया है कि कुछ देर बाद यह दोहराव लगने लगता है। नीलेश के किरदार को सिर्फ अपमान सहते हुए दिखाया गया है, जिससे वह मजबूत किरदार की बजाय एक असहाय विक्टिम जैसा लगता है। फिल्म का पहला आधा हिस्सा तो इन्हीं घटनाओं में बीत जाता है।
अभिनय: दमदार लेकिन बेजान
सिद्धांत चतुर्वेदी ने नीलेश के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश की है। जब वह गुस्से में फटता है या लाचार महसूस करता है, तो उनका दर्द साफ दिखता है। वहीं तृप्ति डिमरी ने विधि के किरदार में जान डाल दी है। उनके शांत और दृढ़ अभिनय ने किरदार को ताकत दी है। कुछ जगहों पर, उनका गुस्सा और निराशा पर्दे पर महसूस होती है। दोनों की केमिस्ट्री भी कुछ सीन में अच्छी लगती है।
लेकिन, सिर्फ अच्छा अभिनय पूरी फिल्म को नहीं बचा सकता। जब कहानी ही कमजोर हो, तो कलाकार भी क्या करें?
निर्देशन और संगीत: कहाँ चूक गए?
निर्देशक शज़िया ज़ाहिद इकबाल ने ‘धड़क 2’ को एक संजीदा फिल्म बनाने की कोशिश की है, लेकिन उनकी कोशिशें अधूरी रह गईं। फिल्म की गति बहुत धीमी है और कहानी में कई छोटे-छोटे हिस्से ऐसे हैं जिनका कोई मतलब नहीं निकलता। कॉलेज की राजनीति वाला subplot भी पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता। सबसे बड़ी कमजोरी फिल्म का संगीत है, जो पहली ‘धड़क’ के मुकाबले बिल्कुल फीका है। फिल्म में एक भी गाना ऐसा नहीं है जो दिल को छू जाए।
आखिर क्यों देखें या न देखें?
अगर आप एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो जातिवाद के मुद्दे पर बहस छेड़े, तो शायद यह फिल्म आपको कुछ हद तक पसंद आए। खासकर अगर आपने तमिल फिल्म ‘पेरियेरुम पेरुमल’ नहीं देखी है, तो आपको इसकी कहानी नई लग सकती है।
लेकिन, अगर आप एक ऐसी फिल्म की उम्मीद कर रहे हैं जिसकी कहानी मजबूत हो, किरदार अच्छे से लिखे गए हों, और जो दिल को छू जाए, तो यह फिल्म आपको निराश करेगी। यह बस ‘जाति’ के नाम पर बनी एक और खोखली कहानी है जो अपने वादे पूरे नहीं कर पाई।
‘धड़क 2’ एक अच्छा मौका था जो गंवा दिया गया है। यह एक गंभीर मुद्दे पर बनी फिल्म है, लेकिन कमजोर कहानी और बेजान संगीत की वजह से यह सिर्फ एक औसत फिल्म बनकर रह जाती है। इसे सिनेमाघर में देखने से बेहतर है कि आप इसका ओटीटी पर आने का इंतजार करें।
