50, 150 या 300? जान लें अपनी सेहत के लिए सही पैमाना क्या है.आपके RO पानी का TDS बहुत कम है? जानिए WHO, BIS और एक्सपर्ट्स के अनुसार पीने के पानी का सही TDS कितना होना चाहिए और कम TDS वाला पानी सेहत को कैसे प्रभावित कर सकता है.क्या आपके घर के RO पानी का TDS 30 या 40 है? अगर हां, तो यह खबर आपके लिए है. बहुत से लोग कम TDS को ज्यादा शुद्धपानी मानते हैं, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार जरूरत से ज्यादा कम TDS वाला पानी शरीर को जरूरी मिनरल्स से दूर कर सकता है.
पीने के पानी का सही टीडीएस कितना होना चाहिए और इसे समझना हमारी सेहत के लिए क्यों इतना जरूरी है.आखिर ये TDS होता क्या है?TDS का पूरा नाम है ‘टोटल डिसाल्व्ड सॉलिड्स’ (Total Dissolved Solids). आसान शब्दों में कहें तो पानी में घुले हुए कुल ठोस तत्व. जब बारिश का पानी जमीन पर गिरता है या पहाड़ों और मिट्टी से होकर बहता है, तो रास्ते में कई कुदरती खनिज उसमें घुल जाते हैं. इसमें दो तरह की चीजें होती हैं:
सेहत के लिए अच्छे मिनरल्स: जैसे कैल्शियम (हड्डियों के लिए), मैग्नीशियम (दिल और मांसपेशियों के लिए), पोटेशियम और सोडियम.
नुकसानदेह जहरीले तत्व: जैसे सीसा (Lead), आर्सेनिक, पारा, फ्लोराइड, कीटनाशक और नालियों या फैक्ट्रियों से रिसने वाले केमिकल.जब हम टीडीएस मीटर से पानी नापते हैं, तो वह यह बताता है कि एक लीटर पानी में ये सारे घुले हुए कण कुल कितने मिलीग्राम (mg/L या PPM) मौजूद हैं. समस्या यह है कि टीडीएस मीटर यह फर्क नहीं कर पाता कि इसमें कैल्शियम कितना है और कचरा कितना. वो बस कुल ठोस तत्वों की संख्या नाप देता है.
पीने के पानी का सही TDS कितना होना चाहिए?
जीरो-बी (ZeroB) के वाटर गाइड और ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, पानी के टीडीएस को इन श्रेणियों में समझा जा सकता है:
50 से कम TDS: यह पानी सेहत के लिए ठीक नहीं माना जाता. इसमें जरूरी मिनरल्स बिल्कुल गायब होते हैं. इसे बहुत ज्यादा हल्का और एसिडिक पानी माना जाता है.
50 से 150 TDS: यह पानी उन इलाकों के लिए स्वीकार्य है जहां पानी में भारी धातुएं ज्यादा होती हैं, लेकिन लंबे समय तक इसे पीना आदर्श नहीं माना जाता.
150 से 300 TDS: यह इंसानी शरीर के लिए सबसे परफेक्ट और बेस्ट टीडीएस लेवल है. इसमें पानी का स्वाद भी मीठा रहता है और शरीर को जरूरी कुदरती मिनरल्स भी भरपूर मिलते हैं.
300 से 500 TDS: यह पानी भी पीने के लिए पूरी तरह सुरक्षित और ठीक माना जाता है.
500 से 1000 TDS: इस पानी का स्वाद भारी या थोड़ा खारा हो सकता है. इसे फिल्टर करके ही पीना बेहतर है.
1000 से 2000 TDS: यह पानी बहुत ज्यादा खारा और भारी होता है. बिना एडवांस आरओ प्यूरीफायर के इसे पीना नुकसानदेह हो सकता है.
5 संकेत कि आपके RO का TDS जरूरत से ज्यादा कम है
पानी बेस्वाद लगना
बार-बार प्यास लगना
RO का TDS 50 से कम होना
पानी बहुत हल्का लगना
मैकेनिक का बार-बार TDS कम करने की सलाह देना
30 TDS वाला पानी पीकर क्या आप गलती कर रहे हैं?
हमारे यहां ज्यादातर लोग यह गलती करते हैं कि आरओ मैकेनिक से कहकर टीडीएस को 40-50 करवा लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि पानी जितना हल्का होगा, उतना साफ होगा. लेकिन यह बहुत बड़ी गलतफहमी है.
घर पर पानी का TDS कैसे नापें और सही कैसे रखें?
आपको किसी लैब में जाने की जरूरत नहीं है. बाजार या ऑनलाइन 150 से 200 रुपये में एक छोटा सा डिजिटल टीडीएस मीटर मिल जाता है.
अपने नल या बोरवेल के सादे पानी को एक साफ गिलास में लें और मीटर डालकर नापें.
अगर आपके घर के सप्लाई या बोरवेल के पानी का टीडीएस 200 से 300 के बीच है, तो आपको आरओ लगाने की बिल्कुल जरूरत नहीं है. आप सिर्फ एक सादा यूवी (UV+UF) प्यूरीफायर लगा सकते हैं, जो कीटाणुओं को मारेगा लेकिन कुदरती मिनरल्स को बचाकर रखेगा.
अगर पानी का टीडीएस 600, 800 या 1200 आ रहा है, तब आरओ लगवाना मजबूरी है. लेकिन आरओ लगवाते समय मैकेनिक को सख्त हिदायत दें कि टीडीएस कंट्रोलर की मदद से आउटपुट पानी का टीडीएस 150 से 250 के बीच सेट करे, 100 से नीचे कभी न जाने दे.
अगर टीडीएस कम हो ही चुका है, तो अपने आरओ में एक मिनरल कार्ट्रिज या एल्कलाइन फिल्टर जुड़वाएं, जो पानी में दोबारा जरूरी पोषक तत्व घोल देता है.
एक और देसी और सबसे असरदार तरीका यह है कि आरओ के पानी को मिट्टी के मटके में भरकर रखें. मटका पानी के एसिडिक नेचर को न्यूट्रलाइज करता है और उसमें कुदरती ठंडक भर देता है.
काम की सलाह
अपने घर के पानी का टीडीएस आज ही चेक करें और उसे 150 से 300 के सुरक्षित दायरे में रखें ताकि आपका परिवार सचमुच सेहतमंद रहे.
WHO क्या कहता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अपनी एक ऐतिहासिक रिपोर्ट ‘हेल्थ रिस्क फ्रॉम ड्रिंकिंग डिमिनरलाइज्ड वाटर’ में बहुत कड़े शब्दों में चेताया है:
हड्डियों की कमजोरी: पानी से हमारे शरीर को रोज की जरूरत का 10 से 20 फीसद कैल्शियम और मैग्नीशियम मिलता है. जब पानी का टीडीएस बहुत कम हो जाता है, तो शरीर अपनी जरूरत पूरी करने के लिए हमारी ही हड्डियों और दांतों से कैल्शियम सोखना शुरु कर देता है. नतीजा यह होता है कि जोड़ों का दर्द और आस्टियोपोरोसिस की समस्या कम उम्र में ही घेर लेती है.
दिल की बीमारियां: मैग्नीशियम हमारे दिल की धड़कनों को सामान्य रखने का काम करता है. लो-टीडीएस पानी से शरीर में मैग्नीशियम की कमी हो जाती है, जिससे दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ता है.
पेट में गड़बड़ी और एसिडिटी: बहुत कम टीडीएस वाला पानी हल्का एसिडिक (अम्लीय) बन जाता है. ऐसा पानी लगातार पीने से गैस, अपच और पेट में जलन की शिकायत रहने लगती है.
प्यास न बुझना: मिनरल्स न होने की वजह से ऐसा पानी पीने के बाद भी शरीर में डिहाइड्रेशन जैसा महसूस होता है और बार-बार पेशाब जाने की नौबत आती है. Also Read: 30-35 की उम्र में सफेद क्यों हो रहे हैं नोएडा वालों के बाल? कहीं हार्ड वॉटर तो नहीं जिम्मेदार
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) क्या नियम तय करता है? भारत सरकार की संस्था ‘ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स’ (BIS IS 10500:2012) के अनुसार, पीने के पानी का सुरक्षित टीडीएस 500 mg/L तक होना चाहिए. अगर पानी का कोई दूसरा विकल्प मौजूद न हो, तो यह 2000 mg/L तक भी स्वीकार्य है, बशर्ते उसमें लेड या आर्सेनिक जैसे जहरीले केमिकल न मिले हों.
