समय भास्कर मनोरंजन डेस्क | Mumbai 

देश के सबसे बड़े और बहुचर्चित रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ के घर में उस वक्त हड़कंप मच गया जब आधी रात को अचानक मुख्य दरवाज़ा खुला और प्रसिद्ध गायक व राजनेता मनोज तिवारी की बेटी रीति तिवारी (Riti Tiwari) को बेघर कर दिया गया।

शो से बाहर आते ही सोशल मीडिया का एक तबका इसे सही ठहराते हुए जश्न मनाने लगा कि मर्यादा लांघने और तीखी बहस करने वाले कंटेस्टेंट को बाहर किया गया। लेकिन इस सतही हंगामे के पीछे का सच यह है कि यह निष्कासन जनता के वोटों की अदालत में नहीं, बल्कि मेकर्स के एक विवादास्पद ट्विस्ट के तहत हुआ है।

रीति तिवारी के अचानक बाहर होने, सीक्रेट रूम के कंटेस्टेंट्स को दिए गए वीटो पावर, घर के भीतर बॉडी शेमिंग के दोहरे मापदंड और ओटीटी टीआरपी की अंदरूनी जंग की पड़ताल:

जनता के वोट नहीं, सीक्रेट रूम के कंटेस्टेंट्स बने जज

इस पूरे एविक्शन का सबसे बड़ा तकनीकी और नैतिक सवाल यह है कि रीति तिवारी को दर्शकों ने वोट आउट नहीं किया। उन्हें बाहर करने का फैसला सीक्रेट रूम में बैठे तीन कंटेस्टेंट्स—माही विज, यंग DSA और उदिति सिंह के हाथों में सौंपा गया था।

घर के समीकरणों को जानने वाले दर्शक यह अच्छी तरह समझते हैं कि शो के भीतर रीति तिवारी का सबसे सीधा और तीखा टकराव उदिति सिंह के साथ ही चल रहा था। ऐसे में जिस कंटेस्टेंट के साथ सीधा व्यक्तिगत विवाद हो, उसी के हाथ में एलिमिनेशन की चाबी थमा देना किसी भी खेल के निष्पक्ष नियमों के बिल्कुल उलट है। खेल के जानकारों का मानना है कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि एक ऐसा सुनियोजित दांव था जिसका नतीजा पहले से तय था।

आक्रामकता के पीछे का अकेलापन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

रीति तिवारी एक नामचीन और दिग्गज पिता की संतान हैं, जो खुद रॉकस्टार बनने का सपना लेकर इस बड़े मंच पर आई थीं। लेकिन कैमरे की चकाचौंध के पीछे उनके मानसिक संघर्ष को नजरअंदाज कर दिया गया। जब किसी बच्चे के सामने उसका पूरा परिवार बिखर जाता है और माता-पिता की राहें अलग हो जाती हैं, तो उस दौर से गुजरने वाले किसी भी युवा के ज़ेहन पर गहरा भावनात्मक असर पड़ता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो जो इंसान भीतर से जितना असुरक्षित और अकेला महसूस करता है, वह बाहरी दुनिया के सामने उतना ही सख्त और आक्रामक रुख अख्तियार करता है ताकि कोई उसकी कमजोरी न पकड़ सके। घर के भीतर काजी तौकीर या उदिति सिंह के साथ हुई बहसें और तीखी भाषा दरअसल उनकी बदतमीजी से ज्यादा उनका डिफेंस मैकेनिज्म (आत्मरक्षा का तरीका) थीं। मेकर्स ने उनके इस भावनात्मक दबाव और अकेलेपन को समझने के बजाय केवल उनकी तल्खी को कैमरे पर दिखाकर टीआरपी का औजार बना दिया।

दोहरे मापदंड: बॉडी शेमिंग पर चुप्पी और गुस्से पर क्लास

इस सीजन में वीकेंड के वार पर भी मेकर्स और होस्टिंग के रवैये पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जब रीति तिवारी ने गुस्से में आकर तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया, तो वीकेंड पर उनकी जमकर क्लास लगाई गई और उन्हें मुख्य विलेन की तरह पेश किया गया।

लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि जब उसी घर के भीतर कुछ कंटेस्टेंट्स द्वारा रीति तिवारी को खुलेआम ‘बॉडी शेम’ किया गया, उनके चेहरे और वजन पर भद्दी और अपमानजनक टिप्पणियां की गईं, तब किसी भी मंच पर उस स्तर की सख्ती नहीं दिखाई गई। किसी लड़की के शरीर और शक्ल का मजाक उड़ाना मनोरंजन की श्रेणी में कैसे आ सकता है? पहले किसी प्रतियोगी को निजी तौर पर इतना उकसाना कि वह अपना आपा खो दे, और फिर उसके पलटवार को ही आधार बनाकर बाहर का रास्ता दिखा देना—यह रियलिटी टीवी का सबसे पुराना और क्रूर पैंतरा रहा है।

टीआरपी का समीकरण: क्या बिहार के वोट बैंक के लिए आएगा नया चेहरा?

इस निष्कासन के पीछे सिर्फ घर के झगड़े नहीं, बल्कि प्लेटफॉर्म्स के बीच चल रही टीआरपी की गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी जुड़ी है। इस समय बिग बॉस के सामने प्रतिद्वंद्वी शो ‘राइज एंड फॉल’ खड़ा है, जहाँ बिहार से तीन मजबूत चेहरे अपनी धाक जमाए हुए हैं।

बिग बॉस के पास उत्तर भारत और बिहार के बड़े दर्शक वर्ग को जोड़ने के लिए मुख्य रूप से दो चेहरे थे, जिनमें से एक रीति तिवारी थीं। अब रीति के अचानक बेघर होने से शो के हाथ से एक बड़ा लॉयल ऑडियंस बेस खिसकने का जोखिम पैदा हो गया है। टेलीविजन गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि मेकर्स इस बड़े नुकसान की भरपाई करने के लिए आने वाले दिनों में बिहार से ही किसी बड़े सोशल मीडिया स्टार या लोकप्रिय इन्फ्लुएंसर को बतौर वाइल्ड कार्ड एंट्री घर में उतार सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण: क्या सिर्फ टूटन का तमाशा बनकर रह गए हैं रियलिटी शोज़?

रीति तिवारी का यह मिड-नाइट एविक्शन एक बार फिर यह कड़वा सच उजागर करता है कि आज के रियलिटी शोज़ में इंसानी जज्बातों, मानसिक स्वास्थ्य और निष्पक्ष खेल से ऊपर केवल टीआरपी का मीटर मायने रखता है। किसी कंटेस्टेंट की टूटन और गुस्से को टीआरपी के लिए भुनाना और फिर उसे एक झटके में दूध की मक्खी की तरह बाहर कर देना किसी भी स्वस्थ मंच की पहचान नहीं हो सकती।

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