समय भास्कर ब्यूरो | नई दिल्ली
दिल्ली का प्रगति मैदान एक बार फिर दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक हलचल का गवाह बन रहा है। भारत की मेजबानी में 18वां ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन भारत मंडपम में शुरू हो गया है। 12 और 13 सितंबर तक चलने वाली इस बैठक पर सिर्फ सदस्य देशों की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया और खासकर पश्चिमी मुल्कों की नजरें टिकी हैं।
इस सम्मेलन का सबसे बड़ा सियासी और कूटनीतिक मोमेंट है चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत आना। साल 2020 में हुए गलवान संघर्ष के बाद शी जिनपिंग का यह पहला भारतीय दौरा है। इसके अलावा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की मौजूदगी ने इस समिट को ग्लोबल पावर-पॉलिटिक्स का अखाड़ा बना दिया है।
मोदी-शी आमने-सामने: कज़ान, तियानजिन और बिश्केक के बाद दिल्ली की बारी
कूटनीति के जानकारों के लिए भारत मंडपम का सबसे अहम कमरा वही है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बातचीत हो रही है।
यह कोई अचानक हुई मुलाकात नहीं है, बल्कि पिछले दो सालों से चल रही बातचीत की अगली कड़ी है:
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अक्टूबर 2024 (कज़ान, रूस): 16वें ब्रिक्स के दौरान दोनों नेता बैठे और सीमा पर तनाव घटाने (डिसइंगेजमेंट) की पहली ठोस शुरुआत हुई।
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अगस्त 2025 (तियानजिन, चीन): एससीओ की बैठक में दोनों के बीच रिश्तों को सामान्य करने पर चर्चा आगे बढ़ी।
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अगस्त-सितंबर 2026 (बिश्केक, किर्गिस्तान): 26वें एससीओ शिखर सम्मेलन के मंच पर दोनों नेता फिर रूबरू हुए।
अब दिल्ली की इस बैठक में भारत का रुख बिल्कुल साफ है—जब तक एलएसी (LAC) पर पूरी तरह अमन-चैन बहाल नहीं होगा, तब तक रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। साथ ही, दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन और रणनीतिक भरोसे की बहाली पर भी दो-टूक बातचीत चल रही है।
ब्रिक्स 2026 की थीम: आंकड़े नहीं, इंसान पहले
इस साल 1 जनवरी को जब भारत ने ब्रिक्स की कमान संभाली, तो एजेंडा एकदम साफ रखा गया था। इस बार की आधिकारिक थीम है—“Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability”।
सीधे शब्दों में कहें तो इसका मकसद कागजी संधियों से निकलकर आम आदमी की जिंदगी आसान बनाना है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे “ह्यूमन फर्स्ट” मॉडल का नाम दिया है, यानी आर्थिक विकास की दौड़ में इंसान पीछे न छूट जाए।
मीटिंग का असली एजेंडा: डॉलर का दबदबा घटाने की तैयारी
इस दो दिवसीय सम्मेलन में पर्दे के पीछे जो सबसे बड़ा आर्थिक दांव खेला जा रहा है, वह है अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना:
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अपनी करेंसी में कारोबार: ब्रिक्स देश अब आपस में डॉलर के बजाय रुपया, रूबल, युआन और दिरहम जैसी स्थानीय मुद्राओं में पेमेंट करने का मजबूत सिस्टम तैयार कर रहे हैं।
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ग्लोबल सप्लाई चेन: युद्ध और पाबंदियों के इस दौर में तेल, खाद और अनाज की सप्लाई न रुके, इसके लिए सदस्य देशों के बीच डायरेक्ट ट्रेड रूट तय किए जा रहे हैं।
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भारत का डिजिटल डंका: भारत मंडपम के हॉल नंबर 14 में लगी ‘भारत इनोवेट्स’ प्रदर्शनी में पीएम मोदी खुद दुनिया भर के नेताओं को भारत का यूपीआई (UPI), आधार और एआई मॉडल दिखा रहे हैं, जिसे अब कई विकासशील देश अपनाने की तैयारी में हैं।
यूक्रेन और मिडिल ईस्ट पर भारत का रुख: ‘युद्ध के बीच तरक्की मुमकिन नहीं’
जब पुतिन और पेज़ेश्कियान जैसे नेता एक ही छत के नीचे हों, तो यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट का तनाव उठना तय था। भारत ने यहां भी अपना पुराना और मजबूत स्टैंड दोहराया। पीएम मोदी ने साफ कहा कि बमबारी और बंदूकों के साए में दुनिया आगे नहीं बढ़ सकती। कोई भी विवाद हो, उसका हल सिर्फ और सिर्फ बातचीत की मेज पर ही निकलेगा।
11 देशों का कुनबा: G-7 के सामने खड़ा नया पावरहाउस
20 साल पहले जब ब्रिक्स बना था, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह इतना बड़ा मंच बन जाएगा।
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मूल रूप से भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के इस ग्रुप में अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश जुड़ चुके हैं।
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सऊदी अरब की मजबूत साझेदारी के साथ यह ब्लॉक अब दुनिया की लगभग आधी आबादी (49.5%) और 40% वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखता है।
13 सितंबर को आएगा ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’
सुरक्षा के लिहाज से पूरी राजधानी को हाई अलर्ट पर रखा गया है। चप्पे-चप्पे पर दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों का कड़ा पहरा है। यह सम्मेलन 13 सितंबर को आम सहमति से बनने वाले ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ के साथ खत्म होगा, जो यह तय करेगा कि आने वाले दिनों में दुनिया की अर्थव्यवस्था किस करवट बैठने वाली है।
